गर्मियों की छुट्टियों में घर पर ही था। दीदी की शादी को तीन साल हो चुके थे और जिजाजी दिल्ली में नौकरी करते थे। इस बार वो अकेले ही गाँव आए थे। नाम था रिया भाभी। उम्र करीब 29 की, गोरी, मटमैली आँखें, और वो कातिलाना मुस्कान जो देखते ही दिल में कुछ हलचल मचा देती थी।
रात के करीब 11:30 बजे थे। बिजली चली गई थी। लू चल रही थी, पसीने से तन चिपक रहा था। मैं छत पर सोने गया था। अचानक नीचे से हल्की-हल्की आवाज़ आई – जैसे कोई दरवाज़ा खोल रहा हो।
मैंने झुककर देखा।
भाभी अपने कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलीं। नीले रंग की पतली सिल्क की नाइटि पहनी थी, जो पसीने से भीगकर उनके शरीर से चिपकी हुई थी। चाँदनी में उनका हर कर्व साफ़ दिख रहा था। वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर आ गईं।
"अरे अंजलि... तुम यहाँ?" मैंने धीमी आवाज़ में पूछा।
"नींद नहीं आ रही... गर्मी बहुत है," कहते हुए वो मेरे पास वाली चारपाई पर बैठ गईं। इतने पास कि उनकी साँसों की गर्मी मुझे महसूस हो रही थी।
कुछ देर खामोशी रही।
फिर भाभी ने अचानक मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराई।
"तुम्हें पता है... जिजाजी तीन महीने से घर नहीं आए।"
उनकी आवाज़ में कुछ अलग था। थोड़ी सी शिकायत, थोड़ी सी बेचैनी।
मैं चुप रहा। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
"कभी-कभी लगता है... मैं औरत ही नहीं रही," उन्होंने धीरे से कहा और अपनी नज़रें नीचे कर लीं।
मैंने हिम्मत करके उनका हाथ पकड़ा।
उनकी हथेली गर्म थी, नरम। उन्होंने हाथ नहीं छुड़ाया। बल्कि उंगलियाँ मेरी उंगलियों में फँसा लीं।
"भाभी..." मैंने बहुत धीरे से कहा।
उन्होंने एक पल मेरी आँखों में देखा।
फिर धीरे से मेरे करीब आईं। इतने करीब कि उनके होंठ मेरे होंठों से बस कुछ सेंटीमीटर दूर थे।
"चुप... बस एक रात की बात है," उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा।
"कल सुबह सब भूल जाएँगे।"
उस रात हमने चाँदनी में एक-दूसरे को बहुत देर तक महसूस किया।
उनकी साँसें तेज़ होती गईं। मेरे हाथ उनके शरीर पर घूमते रहे। वो कभी हल्के से कराहतीं, कभी मेरे कंधे पर मुँह छुपा लेतीं।
सुबह होने से पहले वो उठीं।
मेरे माथे पर एक हल्का-सा किस किया और बोलीं,
"अब जाओ... और याद रखना – ये हमारा राज़ रहेगा।"
वो चली गईं।
मैं वहीं पड़ा रहा।
दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
और पता नहीं क्यों... लग रहा था कि ये आखिरी रात नहीं, शुरुआत थी।
(काल्पनिक कथा है, वास्तविकता से कोई संबंध नहीं।) 😏


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